माँ! तुम होती तो कैसा होता – शशि कुमार आँसू

माँ! मैंने हर जगह ढूंढा तुमको

कभी तेरे किताबों के पन्नों मे,
कभी तेरे छोड़ गए गहनों मे,
कभी तेरे अधूरे लिखे लब्ज़ो में,
कभी तेरी मनमोहनी किस्सों में।

क्या था जो मुझको तज़ गयी
क्या एक दिवस का साथ था!
यूँ क्यूँ पंचतत्तव मे बिखर गयी!
किस भरोसे तुम मुझे तज़ गयी!

क्या मुझमें कोई कमी रही,
या मुझसे तुम नाराज थी!
जन्म दिया और चल बसे!
क्या देखने की जिद्द न थी!
या दिखलाने का मर्म न था!

क्या उन्हे मालूम न था?
उनके रचे इस लोक में,
बिन मां कैसे जीऊंगा मैं
तानो भरे विघ्न दंश को,
अकेले रूदन कैसे सहूंगा मैं।

माँ! तुम ही अब कहो यहाँ,
किस किस को माँ कहूँगा मैं!

शिकवा है पर उस रब से है
माँ! तुझसे कोई गीला नहीं।
तुम लड़ गयी होगी काल से
जब मैं भी तुझे मिला नहीं।

भगवान थे! रुक जाते वो!
कहती तो शायद झूक जाते वो!
क्यों मातृत्व मुझसे छीन गया!
क्यों अधिकार मेरा निल गया।

माँ! ये कौन सा नसीब है!
न तु है! न तेरी तस्वीर है!

माँ! सबसे अक्सर पूछता हूँ
तेरी शक्लों सूरत कैसी थी?
हर लोग बरबस यह कहते हैं,
तेरी आंखे हुबहू मेरी जैसी थी।

यूं तो लबरेज थी पानी से पर,
बरसात में नाचती मोरनी सी थी।

माँ ढूँढा करता हूँ तुम्हें अपने चेहरे में

तुझे पहचानूंगा कैसे?
तुझे देखा ही नहीं

ढूँढा करता हूं तुम्हें
अपने चेहरे में ही कहीं

लोग कहते हैं
मेरी आँखें मेरी माँ सी हैं
यूं तो लबरेज़ हैं पानी से
मगर प्यासी हैं
सामने दाँतों का वक़्फा है
तेरे भी होगा

एक चक्कर
तेरे पाँव के तले भी होगा
जाने किस जल्दी में थी
जन्म दिया, दौड़ गयी
क्या खुदा देख लिया था
कि मुझे छोड़ गयी

मेल के देखता हूं
मिल ही जाए तुझसी कहीं
तेरे बिन ओपरी लगती है
मुझे सारी जमीं

तुझे पहचानूंगा कैसे?
तुझे देखा ही नहीं
माँ ये आपको समर्पित की है!

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